वोह ! मेरी कविता
वो मुझे ढूँढ़ती हैं
मैं उसे ,
ढूँढते एक -दूसरे को
हम
कभी तो कई दिनों तक
दूर -दूर तक
नज़र नही आती वो मुझे ,
पर अचानक कभी
चुपचाप मेरे पास
देखता हूँ खड़ी हैं वो
कँहा से आयी ,कब ?
कुछ पता नही
कुछ कहने को
कोई बात जरूरी मानो ,
और ज्यादा कुछ नही
क्यों की कर्तव्य की
मर्यादा लिये वो रहती हैं
मैं भी रहूँ कर्तव्यों के दायरे
शायद मुझसे कहती हैं ,
वो मेरी प्रिया
वोह ! मेरी कविता ॥
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