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मूँगफली के दाने

                
                                                         
                            क्यों न लेता चलूूूं
                                                                 
                            
शहर से ,
कुछ माँ के लिये भी
अक्सर पूछने पर
डांटती -फटकारती फोन पर
अरे ! सब कुछ तो है
कुछ मत लाना मेरे लिये
परेशान न होना मेरे लिये ,
भला कैसे मान जाऊँ ?
खाली हाथ जाऊँ ,
बिना लिये कुछ माँ के लिये
पर सच हैं कुछ
मिल पाता नहीं मुझे
सोचता हूँ दुकानों पर जब
कीमत कुछ नही
इस संसार में ,
तुच्छ सबकुछ
नज़र हैं आता
मुझे इस ब्रह्मांड में ,
समक्ष माँ के ,
और खरीद लेता हूँ
मन की सुनकर ,
गठरी बाँधकर झोले में
रख लेता हूँ ,
मूँगफली के दाने
जो पसंद हैं बहुत
माँ को ॥


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6 वर्ष पहले

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