क्यों न लेता चलूूूं
शहर से ,
कुछ माँ के लिये भी
अक्सर पूछने पर
डांटती -फटकारती फोन पर
अरे ! सब कुछ तो है
कुछ मत लाना मेरे लिये
परेशान न होना मेरे लिये ,
भला कैसे मान जाऊँ ?
खाली हाथ जाऊँ ,
बिना लिये कुछ माँ के लिये
पर सच हैं कुछ
मिल पाता नहीं मुझे
सोचता हूँ दुकानों पर जब
कीमत कुछ नही
इस संसार में ,
तुच्छ सबकुछ
नज़र हैं आता
मुझे इस ब्रह्मांड में ,
समक्ष माँ के ,
और खरीद लेता हूँ
मन की सुनकर ,
गठरी बाँधकर झोले में
रख लेता हूँ ,
मूँगफली के दाने
जो पसंद हैं बहुत
माँ को ॥
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X