आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मगरमच्छ और बगुला

                
                                                         
                            कई
                                                                 
                            
दिनों का भूखा
मगरमच्छ सोच रहा था
कैसे बचाऊं जान
भूख से मर रहा था
अचानक एक बगुले को देखा
बोला भाई इधर सुनो
मत पीना नदी
का पानी मेरी तरह मत मरो
जहरीला है पानी इसका
अब मैं तो मरने वाला हूँ
पास सुनो मेरी बात आकर
तुम्हें
कहने वाला हूँ
जैसे बगुला पास गया
मगरमच्छ उस पर टूट पड़ा
छटपटाकर बगुला भी
आसमान में उड़ चला ll


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर