गिलहरियां
खेल रही थी
चारदीवारी पर
दीवार से सटे
पेड़ की छाँव में
उछल -उछल कर
खेल -खेलती
मानो अपार खुशी लेकर
सोचा मन क्यों ना ?
दो पल ही सही
खूद को भूल जाऊँ
गिलहरियो के संग
घुल -मिल जाऊँ
आखिर भाग-दौड़
जीवन में
खुशियों के लिये ही तो हैं
भला क्यों ना
खुशियों संग रम जाऊँ
इस तरह
इन्हें कैसे छोड़ जाऊँ ॥
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