आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

चिरैया

                
                                                         
                            आंगन में उतर
                                                                 
                            
कोई चारपाई के सिरहाने
कोई नीचे बैठ तो कोई फुर्र से उड़कर
बैठ डारे से चहचहाने लगी
देख जिन्हे माँ बड़बड़ाने लगी
मुठ्ठी भर दाना भीतर से ले आयी
मानेंगी नहीं चिरैया
पंख फड़फड़ाने लगी
दरअसल बहुत
ख्याल करती है माँ
हरदिन चिरईयो का इंतज़ार
करती है माँ
एक रिश्ता है संग उनसे
बहुत स्नेह करती है माँ II


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर