कभी इस पार दिखता है, कभी उस पार दिखता है.
मुझे तो हर जगह, बस एक मेरा यार दिखता है.
नहीं अहसास है मुझमे,बिछड़ने का जरा भी अब,
मैं देखूँ आइना भी तो , तेरा रुखसार दिखता है.
नहीं दिखता, वो धागा, गूंथ कर रक्खे जो फूलों को,
हमारी आँख को बस खूबसूरत हार दिखता है.
जो तेरा हो गया, दुनिया का फिर वो हो नहीं सकता,
जमाने को वो अक्सर, खुद से ही बेजार दिखता है.
जो मैंने दिल में उसके झाँक कर देखा, तो ये पाया,
वहाँ इनकार में भी, इक छुपा इकरार दिखता है.
तमाशा रौशनी और रंग का, तस्वीर दुनिया की.
जो खुद से हो गये ग़ाफ़िल, उन्हें फ़नकार दिखता है.
जमाने भर की खुशियाँ भी मिलें, पर तू नहीं तो क्या?
बिना तेरे वज़ूद अपना, मुझे बेकार दिखता है.
-सोमेश शर्मा
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