कच्चे धागे की पक्की यादें, मन में रंग भर जाती हैं,
छोटी-सी वो प्यारी बातें, आँखों में उतर जाती हैं।
कलाई पर जब बँधता धागा, रिश्ता और निखर जाता है,
दूर रहे जो अपना कोई, फिर भी दिल के पास आता है।
वो बचपन की मीठी शरारत, वो रूठना और मनाना,
थोड़ी-सी वो मीठी लड़ाई, फिर हँसकर गले लगाना।
एक धागे में बँध जाते हैं, कितने अनमोल अफ़साने,
यादों की उस संदूकची में, बसते कितने ख़्वाब पुराने।
न कोई मोल, न कोई तौला, फिर भी रिश्ता अनमोल,
कुछ रिश्ते चुपचाप कहें सब, बिन बोले उनके बोल।
समय बदलता, राह बदलती, बदल जाते हैं ठिकाने,
पर मन के कोने में रहते, बचपन वाले वो ज़माने।
कच्चा धागा टूट भी जाए, याद कहाँ फिर टूटेगी,
वक़्त भले ही दूर करे पर, प्रीत कहाँ फिर छूटेगी।
एक राखी में प्यार समाया, एक वचन में सारा जहाँ,
कच्चे धागे की पक्की यादें, रहती हैं दिल में सदा जवाँ।
कलाई से बस धागा उतरा, मन से रिश्ता उतरा नहीं,
दूरी आई लाख मगर ये, अपनापन कभी बिखरा नहीं।
कच्चे धागे की पक्की यादें, जीवन भर मुस्काती हैं,
रिश्तों की इस प्यारी डोरी में, साँसों तक बँध जाती हैं।
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