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मेरे अल्फाज़

बसंती की चिठ्ठी

shobhnathsingh yadav

11 कविताएं

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दिन-रात जल रही,सुधियों की बाती ।
ऋतुमती बसंती लिख रही पाती ।।

गेहूँ के खेतों में झूम रही बालियाँ ।
ढोलकी के थापों पे बज रही तालियाँ ।।
रोली,अबीर रंग माथ पे लगाती ।
ऋतुमती बसंती लिख रही पाती ।।

बौराए अमवा में लागल टिकोर वा ।
फगुआ पवनवा बहुत झकझोर वा ।।
धीरे-धीरे साँकल खोल रहा घाती ।
ऋतुमती बसंती लिख रही पाती ।।

गँउवा निहारेला कटि करधनियाँ ।
पँउवा लखेला चाँदी की पैजनियाँ ।।
धूर-घूर देखे,मदन तोरी थाती ।
ऋतुमती बसंती लिख रही पाती ।।

फड़के नयनवा कजरवा लगे काल हो ।
कहूँ क्या सनेसवा,बीत गइले साल हो ।।
प्यासी हूँ,पानी से प्यास नहीं जाती ।
ऋतुमती बसंती लिख रही पाती ।।

लिख रही बार-बार चुभे ला कँगना ।
घर मेरा सूना ,सूना है अँगना ।।
सूनी हैं आँखें ,नींद नहीं आती ।
ऋतुमती बसंती लिख रही पाती ।।



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