आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अजनबी बनके रहे..

                
                                                         
                            अजनबी बनके रहे;
                                                                 
                            
और कहे कौन हो तुम ?

वह कहे हूं तो यूं तेरी ही परछाईं,
ना जाने तुम्हे क्यूं ना जान पाई,

हूं तो हूं तेरे लिए मै एक अजनबी;
फिर भी हूं रोज़ तेरे साथ खड़ी;

अजनबी बनके रहे और
कहे हूं तो तेरी ही परछाईं ..

ना जाने तुम्हे क्यूं ना जान पाई?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर