तिनका बंधे न खाप में, रहकर भी वह दीन,
हवा संग नभ में उड़े, होकर सदा प्रवीन।
लहक जले नित आग में, यही धर्म है, दीन,
कहने को तुम जो कहो, जग में सदा नवीन।
उगे उसर-बंजर धरा, मान भाग्य की रेख,
देना उसका भाव ही, जग में लिखे सुलेख।
करता कब फरियाद रे, अब कर करुणा स्नेह,
वह तो यह ही जानता ,अमर नहीं यह देह।
कहे निराला कर्म ही, जीवन का आधार,
तिनका भी संदेश दे, तज दे अहम विकार।
-संजय निराला
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X