मन व्यथित
मुखड़ा
मन व्यथित, रे धीर धरो,
मोह माया आज तजो।
सुख दुख तेरी कल्पना,
हिय में प्रभो नित्य भजो॥
अंतरा 1
'मैं-मैं' में क्यों खोता जाए,
किसका है तन, रे यह माया?
जन्म-मरण तो तन की लीला,
आत्मा ने कब बंधन पाया?
आत्मा को कोई बाँध न पाए,
यह तो शाश्वत ज्योति निरंतर।
देख स्वयं को अपने भीतर॥
मुखड़ा
मन व्यथित, रे धीर धरो,
मोह माया आज तजो।
सुख दुख तेरी कल्पना,
हिय में प्रभो नित्य भजो॥
अंतरा 2
कुरुक्षेत्र यह तन तेरा है,
अर्जुन संग कृष्ण भी तू है।
रथ पर बैठा सखा सारथी,
कर्ता धर्ता खुद ही तू है।
सत्य, शील, बल, धृति के स्वामी,
उसको न कोई चाह प्यारी।
फिर क्यों मन तू स्वाँग रचाए,
क्यों भटके बनकर संसारी?
अंतरा 3
कर्म करो, फल की चिंता तज,
यह गीता का ज्ञान पुराना।
भ्रम के बंधन काट ज़रा तू,
स्वयं का परिचय ही ठिकाना।
जिसको तू ढूँढ़े जग भीतर,
वह तो तेरे अंतस बैठा।
द्वार-द्वार क्यों भटक रहा है?
पास सदा ही, ओ अनजाना॥
अंतरा 4
हे मन! तू क्यों अधीर इतना,
क्यों हर पल संशय में डोले?
जिसने जीवन दिया तुझे रे,
वह तेरे अंतस में बोले।
शांत हो जरा, सत्य जान ले,
तजकर झूठे सारे पहरे।
कहे निराला— उसके मिलते,
मिट जाते मन के अंधियारे॥
समापन
मन व्यथित, रे धीर धरो,
अपने भीतर दीप जला ले।
तन तो रथ है, आत्मा यात्री,
सारथी को अपना बना ले॥
मन व्यथित, रे धीर धरो...॥
-संजय निराला
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