जिन कमरों को सहता हूं
उन कमरों में रहता हूं
बाहर अच्छे दिखते हो
मैं अंदर की कहता हूं
तुमको क्यों तक़लीफ़ हुई
तुमसे मैं क्या कहता हूं
सोच मेरी इक दरिया है
बहता हूं तो बहता हूं
मेरी जांनिब मत आओ
ख़ुदग़र्ज़ों से कहता हूं
तुमको जगह बनानी है
मैं बहता हूं, सहता हूं
दिन में मैं हूं एक क़िला
शाम ढले मैं ढहता हूं
दूसरे मन को क्या जानूं
अपने मन की कहता हूं
-संजय ग्रोवर
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