जो भी करता हूँ आवेग में आकर
उसी कार्य से डेकोरम टूट जाता है
जो भी उस कार्य का लक्ष्य होता है
उसीका मनोभाव तब रूठ जाता है
भुला रहा हूँअब सीखे हुए ज्ञान को
ससुराल में मैके का ज्ञान छूट जाता है
जिसे समझ रहा था सही अब तक
वही इस अनुभव में बन झूठ जाता है
-कुँवर संदीप सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X