आज गर तुम चुप रहोगे
कल बोलना धिक्कार होगा
बाद में फिर बोलने का
क्या तुम्हें अधिकार होगा
जन्म से दोषी हो तुम
कानून वो बना रहे है
खोदकर खाई को देखो
समानता वो ला रहे हैं
एक आवाज से तुम्हारी
पीढ़ियों पर उपकार होगा
आज गर तुम चुप रहोगे
कल बोलना धिक्कार होगा
स्वार्थ की राजनीति में
देश कब तक बँटता रहेगा
ऊँची कोठियों की नींव में
आमजन कबतक सिसकता रहेगा
लाचार हो माँ भारती तो
क्या तुम्हें स्वीकार होगा
आज गर तुम चुप रहोगे
कल बोलना धिक्कार होगा
प्रतिभाओं का दमनकर
हम हैं विश्वगुरु की राहपर
वो अंधकार को दूर करेंगे
देखो सूरज को तबाह कर
देखो ऐसी नीतियों का
हमसे ना नमस्कार होगा
आज गर तुम चुप रहोगे
कल बोलना धिक्कार होगा
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