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हमारे समय का यथार्थ

                
                                                         
                            अजीब सी दौड़ है इस शहर में,
                                                                 
                            
सब भाग रहे हैं, किसी अनजानी मंज़िल की ओर।
मेट्रो की सीट पर पास-पास बैठे लोग भी,
घंटों एक-दूसरे से कोई बात नहीं करते।
सबके हाथ में चमकती हुई स्क्रीन है,
मगर दिलों के बीच मीलों के फ़ासले हैं।

ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ तो खड़ी हो गईं,
पड़ोस के बंद दरवाज़े के पीछे क्या है, कोई नहीं जानता।
किसी के दुख में अब कंधे पर हाथ रखने वाले कम हैं, रास्ते पर तमाशा देखकर वीडियो बनाने वाले ज़्यादा।

यहाँ इंसान का सम्मान उसकी सादगी से नहीं,
उसकी चमक-दमक और रुतबे से आँका जाता है।मदद की कोई पुकार भीड़ में खो जाती है,
लोग नज़रें चुराकर चुपचाप आगे बढ़ जाते हैं।

यदि हमें सच में एक बेहतर समाज बनना है,
तो केवल कंक्रीट की सड़कें और मकान बदलना काफ़ी नहीं,
हमें अपनी संवेदनहीन सोच को बदलना होगा।
जब तक हम दूसरों की आँखों की नमी नहीं पढ़ पाएँगे,
तब तक यह सारी तरक्की महज़ एक दिखावा है।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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7 घंटे पहले

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