कितने जख्मों को खाकर, ममता नहीं गंवाई है
अपने ही अांंगन की होकर,फिर भी वही पराई है
माली बनकर ना जाने,कितने चमन को सींचा है
नारी की महीमा का, जग ही उत्तम परिभाषा है
कहीं एक चमन पर भी, क्या अपना नाम लिखाई है
अपने ऑगन .....
गागर सर पर रखकर, कितनों घड़ा भरा होगा
सूखे तर रखकर अपने, कितने तर तरा होगा
क्या एक घड़े ने भी , उसकी प्यास बुझायी है
अपने ही.......
सीता दू्र्गा सावित्री भी तू, समय समय पर बन बैठी
लछ्मी बनकर गोरो पर भी, सर बॉध कफन को चढ़ बैठी
क्या दुनिया ने तेरी ममता की, ईतनी कीमत चुकाई है
अपने ही ...
शब्द नहीं है मेरे पास, कैसे तेरा गुणगान करूं
मॉ, बहन या बेटी कहकर, कैसे तेरा सम्मान करूं
देख कर एक औरत की हालत, मेरी भी कलम लजाई है
अपने ही.....
अब सत्ता के गलियारे में भी, तेरी होती चर्चा है
शीशा पोछ रहा है सत्ता, उसके चेहरे पर ही गर्दा है
नारी को व्यापार समझकर, उसकी हिया नहीं शरमाई है
अपने ही.....
..........
By Yaduraj Rishi
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