क्योंकि मैं बेटी हूँ
हां मैं बेटी हूँ ,हाँ मैं ही बेटी हूँ
जन्म से पहले मारी गयी हूँ,
जन्म के बाद सतायी गयी हूँ
अपनों के दिल से निकाली गयी हूँ
हर घर की खुशियां हमसे है पर
हर घर से मैं पराई हुयी हूँ
अपनों के लिए सारे दुख दर्द सह लेती हूँ क्योंकि मैं बेटी हूँ, हां भाई मैं ही बेटी हूँ
सभी ने मेरे छोटे कपड़े जरूर देखे हैं
पर अपनी नियत किसी ने नहीं देखी
हां मैं मानती हूं कि लाख बुराइयां है हममें
पर मेरी अच्छाइयां किसी न नहीं देखी
इन सबके वावजूद भी सबसे खुशियां बांट लेती हूँ
क्योंकि मैं बेटी हूँ, हां मैं ही बेटी हूँ
अब मुझे अंधेरों से डर नहीं लगता
क्योंकि नियत उजालों की ठीक नहीं है
गैरों से भला शिकवा क्यों और कैसे करूं
रिश्ते तो अपनों से ही ठीक नहीं है इन सबके वावजूद भी मैं सबको अपना समझ लेती हूँ
क्योंकि मैं बेटी हूँ हाँ मैं ही बेटी हूँ
हां मैं मानती हूूं कि लाख बुरे हम हैं
पर क्या इसके जिम्मेदार सिर्फ हम हैं
हां मैं मानती हूं कि कुछ जिम्मेवारियां हमारी हैं
पर क्या तेरी जिम्मेवारी हमसे कम है
इन सबके वावजूद भी मैं संसार को समेट लेती हूँ
क्योंकि मै बेटी हूँ हाँ मैं ही बेटी हूँ
मैं भी कुछ करना चाहती हूँ
खुले आसमां में उड़ना चाहती हूँ
जो लिख न सकी ये दुनिया
वो इतिहास लिखना चाहता हूँ
इन सबके वावजूद भी मैं पत्थर पर लकीर खीच देती हूँ
क्योंकि मैं बेटी हूँ
सबके घर की संस्कार हूँ मैं
लोग कहते है लछ्मी का अवतार हूँ मैं
कुछ अपने ही घात लगाये बैठे हैं
ऐसे दरिंदो के हवस की शिकार हूं मैं
इन सबके वावजूद मैं सबसे रिश्ते जोड़ लेती हूं
क्योंकि मै बेटी हूँ हाँ मैं ही बेटी हूँ
हाथ जोड़ कुछ मांग रही हूँ
आशीष मिले तो जी भरकर
मुझे भी जीने दो इस दुनिया में
जहां जी चुके तु जी भरकर
माँ बहन पत्नी सब तुम्हीं से मोल तेती हूं
क्योंकि मैं बेटी हूँ
By Yaduraj Rishi
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