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प्रेम का गुरुत्व

                
                                                         
                            बंदरगाह पर खड़ा वह जहाज
                                                                 
                            
बहुत कुछ कहता है—
कि हर यात्रा का
एक ठिकाना होता है,
और हर ठिकाने के भीतर
एक अगली यात्रा छिपी होती है।

समुद्र मुझे तुम्हारी याद दिलाता है।

ऊपर से शांत,
भीतर से अनगिनत धाराओं से भरा—
बिल्कुल उस मन की तरह
जिसे देखकर कोई नहीं जान सकता
कि उसके भीतर
कितनी तरंगें जन्म ले रही हैं।

तुम मेरे लिए
प्रकाश-स्तंभ हो।

तुम्हें छूने की इच्छा नहीं,
बस इतना कि
दिशा भटकने पर
तुम्हारा प्रकाश
क्षितिज के किसी कोने से
दिखता रहे।

कहते हैं—
समुद्र में ज्वार
चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण से उठता है।

तो फिर
मेरे भीतर उठती ये तरंगें
किस नियम का परिणाम हैं?

किस अदृश्य बल ने
तुम्हें मेरे विचारों की कक्षा में
इतनी स्थायी गति दे दी
कि तुमसे दूर होकर भी
मैं तुम्हारी परिक्रमा करता रहता हूँ?

शायद प्रेम भी
न्यूटन के किसी सूत्र से बाहर
नहीं है।

बस अंतर इतना है—
विज्ञान बल को माप लेता है,
प्रेम उसके प्रभाव को।

पत्तन पर आती लहरें
कभी अपना परिचय नहीं देतीं।

वे बस आती हैं,
तट को छूती हैं
और लौट जाती हैं।

तुम्हारी स्मृतियाँ भी
कुछ ऐसी ही हैं—
आती हैं,
मन के किसी शांत तट को छूती हैं,
और लौट जाती हैं समुद्र में।

लेकिन हर बार
रेत पर कुछ छोड़ जाती हैं—
एक शब्द,
एक मुस्कान,
एक अधूरा संवाद,
या तुम्हारी आँखों की
वह रोशनी
जिसे कोई वैज्ञानिक यंत्र
माप नहीं सकता।

बंदरगाह में
जहाजों की प्रतीक्षा होती है,
और मेरे भीतर
तुम्हारी।

जहाजों को
नक्शे दिशा देते हैं,
मुझे तुम्हारी स्मृतियाँ।

जहाजों के लिए
समुद्र मार्ग है,
मेरे लिए
समुद्र एक रूपक।

वह सिखाता है—
गहराई हमेशा दिखाई नहीं देती,
लहर हमेशा तूफान नहीं होती,
और दूरी हमेशा विरह नहीं होती।

कभी-कभी
दूरी ही वह समुद्र है
जो दो तटों को
अपनी-अपनी पहचान देता है।

शाम ढलती है।

पत्तन के दीप
एक-एक करके जल उठते हैं।

आकाश में
प्रकाश की अंतिम किरण
समुद्र पर लंबी रेखा खींचती है।

मैं सोचता हूँ—
प्रकाश को भी
हमेशा पहुँचने के लिए
समय चाहिए।

फिर प्रेम
तुरंत कैसे पहुँच सकता है?

शायद इसलिए
सच्चा स्नेह
जल्दबाजी नहीं करता।

वह प्रकाश की तरह
अपनी गति से चलता है,
लहर की तरह
अपनी लय में लौटता है,
और समुद्र की तरह
अपनी गहराई
किसी को बताता नहीं।

रात गहरी होती है।

अंतिम जहाज
क्षितिज की ओर बढ़ जाता है।

बंदरगाह फिर शांत है।

पर प्रकाश-स्तंभ अब भी जल रहा है।

शायद प्रेम भी ऐसा ही है—
जहाज चला जाए,
समुद्र बदल जाए,
मौसम बदल जाए,
ज्वार-भाटा बदलता रहे,

फिर भी
किसी मन के पत्तन पर
एक प्रकाश
चुपचाप जलता रहे।

बिना अधिकार के,
बिना अपेक्षा के,
बिना किसी घोषणा के—

सिर्फ इसलिए
कि किसी दूर क्षितिज पर
किसी प्रिय यात्री को
यह विश्वास बना रहे

कि लौटने के लिए
एक पत्तन अब भी है।
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2 घंटे पहले

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