उद्धृत हुई जहाँ कही से भी यह जाति, है जो सकुनी,शूर्पणखा,जयचंद की भांति ,
कारण जिस हुआ सर्वथा मानवता,राष्ट्र उन्नत में घात ,
इसे भी त्यागेंगे सतीप्रथा,भूतवादिता आदि की भांति
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