तेरे अन्याय का एक ही जवाब
तेरे अन्याय का
एक ही जवाब है मेरे पास—
तू जीतकर भी नहीं जीतेगा।
तूने तो सारे प्रबंध कर दिए थे
मेरे रोने के,
कि मैं रोता ही जाऊँ
और कभी न मुस्कराऊँ।
तू पक्का प्रबंध करता चल
मेरे न मुस्कराने का,
मैं भी एक जिद लिए चलता हूँ—
मैं मुस्कराता ही जाऊँगा।
तू मेरी राह में
दुखों के कितने ही पहाड़ रख दे,
मेरी आँखों में
कितने ही आँसू भर दे,
पर मेरी मुस्कान पर
तेरा अधिकार नहीं।
तू मुझे हराने की
पूरी कोशिश करता चल,
मैं हर बार टूटकर भी
खुद को समेटता चलूँगा।
क्योंकि तेरे अन्याय का
मेरा आखिरी जवाब यही है—
तू मुझे रुलाने का प्रबंध करता रह,
मैं मुस्कराने की वजह बनता रहूँगा।
-रजनी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X