प्रतीक्षा में भी परमात्मा होता है
प्रतीक्षा में भी परमात्मा होता है,
यह मैं अब अनुभव के साथ कह सकता हूँ,
लेकिन जब प्रतीक्षा कर रहा था,
तब मुझे स्वयं पर भी भरोसा नहीं था।
भरोसा तो अब आया है,
जब अपनी आँखों से देख लिया है,
और आज भी देख रहा हूँ—
कि प्रतीक्षा कभी व्यर्थ नहीं जाती।
मैंने हमेशा सही राह पर चलने की कोशिश की,
यह सफर बहुत कठिन था,
कई बार लगा कि अब और नहीं चल पाऊँगा,
फिर भी कदम गलत दिशा में नहीं मोड़े।
इसीलिए आज भी कहूँगा—
कितना भी कठिन हो अनुभव,
राह सही हो तो चलते रहना,
क्योंकि मंज़िल से पहले
प्रतीक्षा ही इंसान को बदलती है।
आज खुद को देखकर चकित होता हूँ,
जिस सत्य पर कभी भरोसा नहीं था,
उसे आज अपनी आँखों से देख लिया है—
प्रतीक्षा में भी परमात्मा होता है।
— रजनी
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