जब कोई सुन ही नहीं रहा
यदि मैं अभी तुमसे कुछ कह रहा हूँ,
तो शायद तुम अपने ही मन में चल रही
विचारों की धारा में बह रहे हो—
चाहे वह तुमसे जुड़ी हो
या मुझसे।
तब तुम वर्तमान की बात
न सुन पाओगे,
न समझ पाओगे,
क्योंकि तुमने सुना ही नहीं।
कुछ ऐसा ही तो हो रहा है
पूरी ज़िंदगी में—
लोग साथ चल रहे हैं,
पर एक-दूसरे को सुन नहीं रहे।
हर कोई अपनी ही कहानी में उलझा है,
अपने ही दुख, अपने ही डर,
अपने ही विचारों में खोया है।
कोई बोल रहा है,
कोई सुनने का अभिनय कर रहा है,
पर समझने वाला कोई नहीं।
शायद इसलिए
लोग पास होकर भी दूर हैं—
क्योंकि रिश्तों में दूरी
शरीरों से नहीं,
अनसुने रह गए शब्दों से पैदा होती है।
-रजनी
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