आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जब कोई सुन ही नहीं रहा

                
                                                         
                            जब कोई सुन ही नहीं रहा
                                                                 
                            

यदि मैं अभी तुमसे कुछ कह रहा हूँ,
तो शायद तुम अपने ही मन में चल रही
विचारों की धारा में बह रहे हो—
चाहे वह तुमसे जुड़ी हो
या मुझसे।

तब तुम वर्तमान की बात
न सुन पाओगे,
न समझ पाओगे,
क्योंकि तुमने सुना ही नहीं।

कुछ ऐसा ही तो हो रहा है
पूरी ज़िंदगी में—
लोग साथ चल रहे हैं,
पर एक-दूसरे को सुन नहीं रहे।

हर कोई अपनी ही कहानी में उलझा है,
अपने ही दुख, अपने ही डर,
अपने ही विचारों में खोया है।

कोई बोल रहा है,
कोई सुनने का अभिनय कर रहा है,
पर समझने वाला कोई नहीं।

शायद इसलिए
लोग पास होकर भी दूर हैं—
क्योंकि रिश्तों में दूरी
शरीरों से नहीं,
अनसुने रह गए शब्दों से पैदा होती है।
-रजनी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
13 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर