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अपने भीतर लौटने की यात्रा

                
                                                         
                            अपने भीतर लौटने की यात्रा
                                                                 
                            

अब तक जो भी था,
शायद वह मैं नहीं था,
एक सपना था—
जिसे सच समझकर जीता रहा।

अपने भीतर आ जाना
सबसे कठिन यात्रा है,
और मैं अब तक
बाहर ही भागता रहा।

दुनिया को समझने निकला था,
पर खुद को समझना बाकी था,
अपने सारे स्वार्थ व्यर्थ हैं—
यह जानने की शुरुआत हो गई है।

अब सच से भागना नहीं,
उसे स्वीकार करने की हिम्मत भी आ गई है।

हाँ, मैं गलत था,
बहुत कुछ गलत करता आया हूँ,
पर अब नहीं—

अब खुद से झूठ नहीं बोलूँगा,
अपने भीतर से नहीं भागूँगा,
और जो सच दिखाई दे गया है,
उससे मुँह नहीं मोड़ूँगा।

शायद यही
मेरी असली यात्रा की
पहली सीढ़ी है।

— रजनी
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48 मिनट पहले

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