कल पर्दा उड़ा
तन्हा रातों में लगा कि
जैसे तू खड़ी थी।
थी वही शोखी और वही अदा
जैसे छेड़ती थी तू यदा-कदा।
अचानक, मैं थोड़ा घबराया
हवायें चलकर मेरे पास आयीं
आँखों को छू के मेरे और लब को
उँगलियों से थी आपने सहलाई।
फिर रूह मेरी काँप गयी
हवाओं की छुअन को भाँप गया।
मदभरी आँखें हो गयीं सजल
तेरी यादों में गया मचल,
सुनो ! कभी जो आ भी जाते
फिर अपना हक जताते
मैं रूठ जाता तो तुम मनाते
बेवजह डराते, फिर गले लगाते।
नहीं आओगे तुम, ये भी पता है
लेकिन यार मेरी क्या खता है...
- राहुल प्रसाद
पलामू,झारखंड
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X