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मेरी क्या खता है

Meri kya khta hai
                
                                                         
                            कल पर्दा उड़ा
                                                                 
                            
तन्हा रातों में लगा कि
जैसे तू खड़ी थी।

थी वही शोखी और वही अदा
जैसे छेड़ती थी तू यदा-कदा।

अचानक, मैं थोड़ा घबराया
हवायें चलकर मेरे पास आयीं
आँखों को छू के मेरे और लब को
उँगलियों से थी आपने सहलाई।

फिर रूह मेरी काँप गयी
हवाओं की छुअन को भाँप गया।

मदभरी आँखें हो गयीं सजल
तेरी यादों में गया मचल,
सुनो ! कभी जो आ भी जाते
फिर अपना हक जताते
मैं रूठ जाता तो तुम मनाते
बेवजह डराते, फिर गले लगाते।

नहीं आओगे तुम, ये भी पता है
लेकिन यार मेरी क्या खता है...

- राहुल प्रसाद
 पलामू,झारखंड

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8 वर्ष पहले

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