क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है
बिन अदालत औ मुवक्किल के मुकदमा पेश है
आँख में दरिया है सबके
दिल में है सबके पहाड़
आदमी भूगोल है जी चाहा नक्शा पेश है
क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना हिन्दी साहित्य जगत के एक ऐसे हस्ताक्षर हैं, जिनकी लेखनी से कोई विधा अछूती नहीं रही। चाहे वह कविता हो, गीत हो, नाटक हो अथवा आलेख हो। जितनी कठोरता से उन्होंने व्यवस्था में व्याप्त बुराइयों पर आक्रमण किया, उतनी ही सहजता से वे बाल साहित्य भी रचते रहे।
15 सितंबर 1927 को बस्ती (उ.प्र) में जन्मे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने एक छोटे से कस्बे से अपना जीवन शुरू किया लेकिन जिन रचनात्मक उचाईयों को उन्होंने छुआ, वह अपने आप में ऐतिहासिक है। उनका मानना था कि हमारे पास बच्चों के लिए साहित्य बहुत कम मात्रा में है, इससे बच्चों का भविष्य अधर में होगा। उन्होंने बच्चों के लिए कई कवितायें लिखीं -
इब्नबतूता पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
घुस गई थोड़ी कान में
कभी नाक को, कभी कान को
मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता
उड़ते उड़ते जूता उनका
जा पहुँचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दुकान में
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना कविता की तुकबंदियों से बहुत हद तक अपने को आज़ाद रखते हैं बावजूद इसके कविता के लय में कोई अंतर नहीं आया।
कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे को बिना जाने
पास-पास होना
और उस संगीत को सुनना
जो धमनियों में बजता है,...
उन रंगों में नहा जाना
जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं।
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