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करके देखो

Let's Do
                
                                                         
                            नकाब, चेहरे से हटाकर देखो
                                                                 
                            
उजड़ी बस्ती को बसाकर देखो।

कीमत पैसों की समझ जाओगे
मेहनत से, खुद कमाकर देखो।

हर जर्रे-जर्रे में, राम बसते हैं
हृदय सबरी सा, सजाकर देखो।

बेरहम होकर, गुलाब तोड़ते हो
कभी पौधों को लगाकर देखो ।

प्रेम जुदाई की बातें करते फिरते हैं
ये है क्या, कभी माँ को गले लगाकर देखो।

आजाद देश में बेफिक्र घूमते हो
फर्ज-ए -मिट्टी कभी निभाकर देखो।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले

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