सर्दियों की गुनगुनी धूप में
तेरी यादों की गरमी लपेटकर
खुद से ही बातें करना...
बस अच्छा लगता है हमें
शाम के धुंधलके में
ठिठुरती हुई किसी शाम में
तेरी यादों के चराग़ जलाना
उन ख़ुशगंवार लम्हों को
चरागों की रोशनी में देखना....
अच्छा लगता है हमें
कोहरे की धुंध से भरे मौसम में
किसी सूनसान सड़क पर
यूँ ही तेरी यादों का हाथ थामे
अपने ही साये के साथ
चलते हुए दूर निकल जाना...
बहुत अच्छा महसूस होता है हमे
तुझे ख़्वाबों में देखना
इस एहसास के साथ
कि तुम मेरे करीब हो
लेकिन होते कहां हो तुम...
बस अच्छा लगता है हमें
तेरे इंतज़ार में आँखों को जगाये रखना
तेरे लिये साँसों को जिंदा रखना
तुझे धड़कनों में महसूस करना...
माना कि तुम नहीं हो
फिर भी तुम्हारी यादों में जीना
बस अच्छा लगता है हमें..
- राहुल प्रसाद
पलामू
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