इश्क़ तो कभी कौमों का, मोहताज़ नही होता
मेरे ना हो पाओगे ऐसी, कोई रिवाज़ नहीं होती
तेरा जलवा ना हो तो, मेरी सूरत का असर क्या
दर्द-ए-दिल का सुनते हैं, कोई ईलाज़ नहीं होता
जब भी मोहब्बत घुटती है, आंखों की कोरियों में
बेशर्म इस दुनिया को, इश्क का लिहाज़ नहीं होता
तेरा नाम लिया तो, शायर-ए-ख़ाक बदनाम होगा
कहते हैं मरीज़-ए-दिल का, कोई समाज़ नहीं होता
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