रक़ीबों से शनासाई हमें अच्छी नहीं लगती
मोहब्बत की ये रुसवाई हमें अच्छी नहीं लगती
खुशी में संग रहते हो तो दुख में भी रहो शामिल
फ़क़त झूठी पज़ीराई हमें अच्छी नहीं लगती
कभी ख़ुद को परे रख कर ज़माने की तरफ़ देखो
ये ख़ुदग़र्ज़ी ये दानाई हमें अच्छी नहीं लगती
किनारे पर खड़े हो तुम इधर मँझधार में हम हैं
बनावट की मसीहाई हमें अच्छी नहीं लगती
अगर है चाँद सा चेहरा तो मन भी ख़ूबसूरत हो
किनारे पर जमी काई हमें अच्छी नहीं लगती
निकल कर जिस्म की मस्ती के बाहर रूह भी झाँको
ये बे-मौसम की अंगड़ाई हमें अच्छी नहीं लगती
-पुष्पेंद्र 'पुष्प'
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