बेमतलब की तेरी बातों को,
ना जाने क्युं
अब भी मैं याद करता हुं।
यादों में खो कर तेरी,
मैं खुद से ही तेरी बात करता हुं ।
बेवजह मुस्कुराने लग जाता हुं,
ना जाने क्युं जब भी
मैं तेरा ख्याल करता हुं।
खुद में उलझकर,
मैं खुद से ही सौ सवाल करता हुं ।
मेरे दिल को चाह है तेरी, क्या इसलिए
मैं तेरी परवाह करता हुं।
नहीं जानता मैं की ,
ना जाने क्युं बेतहाशा
मैं तुझसे प्यार करता हुं।
एहसास कम हो सकता नहीं,
तेरे बिन ये दिल कही लगता नहीं।
तेरी यादों में खो कर,
मैं हर- एक लम्बी रात करता हुं।
बेमतलब की तेरी बातों को,
ना जाने क्युं, अब भी
मैं याद करता हुं।।
-प्रीति गौतम
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