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चाँद से इश्क है मुझे

                
                                                         
                            
हाँ है इश्क मुझे चांँद से। तो क्या ?
इसका अर्थ ये नहीं कि तुमसे मोहब्बत नहीं,
हां तुमसे मोहब्बत तो है मगर इश्क नहीं, इश्क तो मैं चांँद से ही करती हूंँ
क्यों न करूंँ वो सिवाए चांँदनी के किसी को नहीं चाहता,
कभी देखा है चांँद को बिन चांँदनी के?
पूनम की रात में जब मिलन होता है चांँद और चांँदनी का कितना नूर बरसता है आसमान में,
अमावस पर शब-ए-हिज्रा न जाने कैसे गुज़रती होगी चांँद की बिन अपनी चांँदनी के,
छुप जाता है कोप भवन में, बिन चांँदनी के उसे भाता नहीं कुछ भी,
ऐसे चांँद से भला कैसे न मैं इश्क करूंँ, क्या तुम निभा पाओगे इश्क ऐसा,
बोलो....हो जाऊंँ मैं पल भर को दूर तो क्या तुम इंतजार में मेरे रह पाओगे
पल भर भी कोप भवन में?
या ढूंढ़ने चल पड़ोगे कोई नई योशिता फिर से,
हांँ मैं जानती हूंँ तुम नहीं कर पाओगे इंतजार, तुम चांँद नहीं हो न,
चांँद ने केवल चांँदनी से ही इश्क किया है, बिना चांँदनी के उसे न कभी वो जिया है।

- प्रेम बजाज 
जगाधरी ( यमुनानगर)
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2 वर्ष पहले

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