आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नारी तेरे रूप अनेक

                
                                                         
                            बेटी बन वो तेरे घर में जन्म लेती है,
                                                                 
                            
कंजक बन तुम्हे वो दर्शन देती है।
सबके दिल को भाती है,
वो बालिग लड़की तुम्हारे घर में चहचहाती है।
फिर शादी कर वो दूसरे घर चली जाती है,
ज़िम्मेदारियां वो दो घर की उठाती है।
पत्नी का कर्तव्य निभाती है,
बहू होने के फ़र्ज़ को भी ना ठुकराती है।
फिर मां बन घर को खुशियों से भर देती है,
ऐ नारी तू कितने रूप दिखाती है।

नारी कुछ ऐसा भी कर जाती है,
हाथों में बंदूक उठा वो देश को बचाती है।
कभी इस देश की सरकार चलती है,
तो कभी कलाकार बन दुनिया पर छाती है।
कभी शायरा बन दिल के हाल सुनाती है,
तो कभी लोगों में जागरूकता फैलाती है।
मां, बेटी, बहू बन वो हर दर्द को हस कर सह जाती है,
वो रक्षक बन दुनिया को दुश्मनों से बचाती है।
सर्व शक्तिशाली है, तुझमें बसती मां काली है,
ऐ नारी तू कितने रूप दिखाती है।
ऐ नारी तू कितने रूप दिखाती है।
- प्रकृति गौरी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर