बेटी बन वो तेरे घर में जन्म लेती है,
कंजक बन तुम्हे वो दर्शन देती है।
सबके दिल को भाती है,
वो बालिग लड़की तुम्हारे घर में चहचहाती है।
फिर शादी कर वो दूसरे घर चली जाती है,
ज़िम्मेदारियां वो दो घर की उठाती है।
पत्नी का कर्तव्य निभाती है,
बहू होने के फ़र्ज़ को भी ना ठुकराती है।
फिर मां बन घर को खुशियों से भर देती है,
ऐ नारी तू कितने रूप दिखाती है।
नारी कुछ ऐसा भी कर जाती है,
हाथों में बंदूक उठा वो देश को बचाती है।
कभी इस देश की सरकार चलती है,
तो कभी कलाकार बन दुनिया पर छाती है।
कभी शायरा बन दिल के हाल सुनाती है,
तो कभी लोगों में जागरूकता फैलाती है।
मां, बेटी, बहू बन वो हर दर्द को हस कर सह जाती है,
वो रक्षक बन दुनिया को दुश्मनों से बचाती है।
सर्व शक्तिशाली है, तुझमें बसती मां काली है,
ऐ नारी तू कितने रूप दिखाती है।
ऐ नारी तू कितने रूप दिखाती है।
- प्रकृति गौरी
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