आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कुछ मीठा हो जाए

                
                                                         
                            थोड़ा सा कुछ मीठा हो जाए
                                                                 
                            
कसैले से लम्हों की यादें भुलाकर
मीठा मधुर एक स्वाद चखा जाए
थोड़ा सा कुछ मीठा हो जाए
कड़वे हो चले रिश्तों की कहानी
अधकच्चे छूटे उन किस्से की ज़ुबानी
कुछ ज़ज़्बातो को साथ पिरोकर
स्नेह चाशनी मे फिर डुबोया जाए
थोड़ा सा कुछ मीठा हो जाए
जिंदगी की जलती पिघलती सांस को
अपनेपन के सांचो मे ढाल कर
बदरंग हो चुकें लम्हों के चेहरों को
कुछ नए रंगों से भिगोया जाए
थोड़ा सा कुछ मीठा हो जाए
कसैले से लम्हों की यादें भुलाकर
मीठा मधुर कुछ स्वाद चखा जाए


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
7 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर