हृदय जब असहनीय यातनाओं के
बाद भी मुस्कुराने लगे,
शोर में निहित खामोशी जब अंतर्मन
को झुलसाने लगे,
हज़ारों इच्छाओं में व्याप्त ये आँखें,
जब बिन अश्रु-नीर छलकाने लगें,
ज़माने से एक भेंट के बाद,
मैंने लौटना चाहा जब ख़ुद की ओर,
तो ये हँसी, ये ख़ुशी, ये मायूसी—सब बहाने लगे।
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