अंजानी सी उलझन की कैसी यह विधा है,
दुविधा में मन या मन ही दुविधा है,
खुशी के रंगों में सांझ है और रंगों सा ही सवेरा है,
फिर मेरे भीतर पसरा कैसा यह अंधेरा है,
हँसी की छाँव में निहाँ अंतर्द्वंद्व यह गहरा है...
दुविधा में मन है या मन ही दुविधा है।
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