नींद से ना जगाओ आसक्त को,
आज अरसो बाद सोया लगता है।
आँखों में उसके कुछ नशा भी है,
मय में खुद को डुबोया लगता है।
देखो तकिया भी गीला है उसका,
आज जी भर के रोया लगता है।
शायद कुछ दर्द कम हुआ उसका,
आज जख्मों को धोया लगता है।
बेपरवाह सा है कुछ बाकी नहीं,
खुद में गुम रुसवा सा लगता है।
अश्क़ों को समेटे अंखियन में,
देखो सब कुछ खोया लगता है।
चिंगारी की लौ दिल में भरकर,
मानो ज़ख्म आग सा लगता है।
नि श्छल स्नेह के बंधन से वो,
अब आजाद सा लगता है।
मोहमाया के बंधन से अब,
खुद को दूर सा रखता है।।
नेहा यादव
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