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नेपाल… तुम्हारा दर्द देखा नहीं जाता

                
                                                         
                            नेपाल… तुम्हारा दर्द देखा नहीं जाता
                                                                 
                            
आज तस्वीरें देखीं नेपाल की,
तो आँखें तस्वीरों पर नहीं ठहरीं…
उन तस्वीरों के पीछे छूट गए घरों पर ठहर गईं।
कहीं घर नहीं रहा,
कहीं रास्ता नहीं रहा,
कहीं लौटने वाला अपना नहीं रहा…
और कहीं एक परिवार के पास
बस इंतज़ार रह गया।
ज़रा सोचिए उस माँ का,
जो दरवाज़े पर आँखें लगाए बैठी होगी—
“मेरा बच्चा आएगा…”
उसे क्या पता,
उसका बच्चा किस मोड़ पर है,
ज़िंदा है भी… या नहीं।
ज़रा सोचिए उस पत्नी का,
जिसने सुबह अपने साथी को विदा किया होगा,
शायद एक साधारण-सा “जल्दी लौटना” कहा होगा…
किसे मालूम था,
वह साधारण-सा पल
ज़िंदगी का आख़िरी सलाम बन जाएगा।
जिस घर को बनाने में
उम्र की कमाई लगी होगी,
जिस आँगन में बच्चों की हँसी गूँजी होगी,
जिस छत के नीचे सपने बुने होंगे—
आज वही घर
मलबे में अपना पता ढूँढ़ रहा है।
हम यहाँ बैठकर
बस तस्वीरें देख सकते हैं…
दो आँसू बहा सकते हैं…
दुआ कर सकते हैं…
लेकिन वहाँ किसी का पूरा संसार
एक पल में उजड़ गया है।
और फिर भी हम इंसान
एक-दूसरे से लड़ने में व्यस्त हैं—
नाम पर, धर्म पर, जाति पर,
छोटी-छोटी बातों पर रिश्ते तोड़ने में व्यस्त हैं।
कभी नेपाल की उस ख़ामोशी से पूछना—
ज़िंदगी से बड़ा क्या है?
अहंकार?
नफ़रत?
या इंसानियत?
आज पहाड़ रो रहे हैं,
नदियाँ अपना दर्द कह रही हैं,
और माटी के भीतर
कितनी अधूरी कहानियाँ सो रही हैं…
हे ईश्वर!
जिसका अपना लापता है,
उसे उसका अपना मिल जाए।
जिसका घर उजड़ा है,
उसके भीतर उम्मीद बची रहे।
और जिसने अपना खोया है,
उसके आँसुओं को
थामने वाला कोई हाथ मिल जाए।
नेपाल,
आज हम तुम्हारा दर्द
पूरा महसूस नहीं कर सकते…
क्योंकि जिस पर बीतती है,
दर्द वही जानता है।
हम तो बस इतना कर सकते हैं—
तुम्हारे लिए रो लें,
तुम्हारे लिए दुआ कर लें,
और इंसानियत के नाम पर
अपने भीतर कुछ बदल लें।
क्योंकि आज तुम्हारी धरती रो रही है…
कल किसकी बारी होगी—
किसे मालूम?
इसलिए जब तक साँस है,
नफ़रत नहीं…
इंसान को इंसान समझकर जीना सीखिए।
🇮🇳🤝🇳🇵
नेपाल, तुम्हारी पीड़ा हमारी आँखों में है,
और तुम्हारे लिए दुआ हमारे दिल में।

 
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4 घंटे पहले

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