14 सितम्बर 2017
हिंदी दिवस के अवसर पर रात 1:51 am पर मैंने एक कविता की रचना की कैसी लगी उत्साह हेतु कमेंट जरुर करे
शीर्षक " अब लौटा दो बचपन मेरा"
वो याद आ रहा है बचपन
जब आज तिमिर ने घेरा है,
गैरो की क्या बातें कहनी
अपनों ने ही मुंह फेरा है,
उस मधुर-मधुर किलकारी से
सम्पूर्ण भवन भर जाता था,
कभी बिम्ब पकड़ता इधर-उधर
मां की छाती लग जाता था,
कभी गोद उठाती हंसी-हंसी
फिर अचरा से ढक लेती थी,
एक तुतले गीत की तान से वो
संचार मधुर भर देती थी
कभी आम्र द्रुम की डार-डार
हम निसदिन मन हरसाते थे
रजनी की झाई पड़ते ही
'नरेन्द्र' लौट कुटुम्ब को आते थे
काहू से लड़ते पल भर मे
काहू को मीत बनाते थे
न द्वेश भाव था चितवन मे
सब पल भर मे मिल जाते थे
लो बीत गया वो स्वप्न भुवन
अब दिवस हरेक बस चलना है
'कल' की है भांति अंग सभी
बस चलते-चलते रहना है
जिसने पकड़-पकड़ कर उंगली को
चलना हमको सिखलाया था
जिस जननी ने भूखे रहकर
हमे दुग्धपान करवाया था
हम भूल उन्हे फिर आज गये
भ्रम के सपनो मे उलझ गये
जब वक्त की ऐसी मार पड़ी
तब 'नरेन्द्र' अचानक सिहर गये
इस माया रूपी पनघट मे
मां की ममता को डुबो दिया
बस मात्र कागजी टुकड़ो हित
अनमोल प्रेम को भुला दिया
ऐसी भी क्या मजबूरी है
जो वक्त नही अपनो के लिए
न कुछ जायेगा संग तेरे
रह जायेगा दूजे के लिए
हे नाथ प्रार्थना है तुमसे
अब जात नही कुछ भी हेरा
सम्पूर्ण हरण कर लो प्रभु तुम
बस लौटा दो बचपन मेरा
बस लौटा दो बचपन मेरा
-नरेन्द्र सिंह "विक्रम"
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