मूँद कर आँखे सोचो जरा
ना मानें तो भी उनको भींचो जरा
क्या दिखे जब खोलो आँखें
मन से अपने पूछो जरा
जो चाहा क्या सच में रंग ज़िंदगी ने वही भरा
कुछ अनचाही सी लगे जो खुली आँखों की हक़ीक़त
तो कहो ना बेझिझक उन पाँवों से मुड़ जायें जरा
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