रास्तों से लड़े हैं तुम्हारे लिए
जाने कब से खड़े हैं तुम्हारे लिए
थक गए हैं निहार कर पथ नयन
आंसुओ में ढले हैं तुम्हारे लिए
-मंजू
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X