अब उम्र झांकती है, सफेद बालों से
कुछ लिपटा हुआ है, अब भी ख्यालों से|
मुरझाया चेहरा, थकीं आंखें, मायूस दिल
लुट चुका है बहुत कुछ, जिंदगी के खजाने से|
अजीब दौर है, उम्र का ये भी
बुढ़ापा आया नहीं, जवानी के जाने से|
एक खलिश सी रह गई शायद
अजीब टीस है, जो बुझती नहीं बुझानें से|
अब वो दौर नहीं आएगा लौटकर मानुष
बीता वक्त भी कभी लौटा है, किसी के मनाने से|
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