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ऋणी हूं मैं

                
                                                         
                            इस धरा का ऋणी हुं मैं;
                                                                 
                            
जिसमें उपजे अन्न ने मेरी उदर पूर्ति की
जिसने मेरी क्षुधा को शांत किया,
जिसने मुझे वो आधार दिया;
संपूर्ण जीवन जिसमें गुजार दिया।

इस अम्बर का ऋणी हूं मैं;
जिसकी नीलिमा के आवरण में
स्नेह का अवलंबन प्रस्फुटित हुआ,
जिसकी छत्र छाया में,
मुझे हर पल किसी अपने का अहसास हुआ।

इस पावन नीर का ऋणी हूं मैं;
जिसके जीवन दायिनी झोंके से
मुझमें नवजीवन का संचार हुआ,
अदृश्य रहकर भी जिसने;
मेरे अस्तित्व को साकार किया।

इस सृष्टि के कण कण का ऋणी हूं मैं;
जिनके समेकित प्रयास से
इस ब्रह्माण्ड का प्रादुर्भाव हुआ।
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3 वर्ष पहले

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