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पतझड़ निश्चित है

                
                                                         
                            ये पतझड़ का महीना भी,
                                                                 
                            
बड़ा खुशनुमा सा होता है
कुछ हल्की सी सरसरी सी हवा
गर्म और ठंढी दोनों का मिश्रण
जिन पेड़ो की हरियाली
और घनापन दूर से ही
देखते बनता था
आज मानो उनकी शाखाएँ 
निर्वस्त्र सी हो गई होI
जिन के घनेपन से
आसमान का हल्का सा
भी दीदार मुश्किल था
उन्हीं पेड़ों के बीच से
मानो मिलों दूर दिख रहा है
पूरी सड़क सुखे पत्तों से
पटी हुई सी थी I
की चलते चलते अचानक
मेरा पैर एक सूखे पत्ते पर पड़ा
तो वो पूरी तरह बिखर गया।
उस बात ने मेरे मन को
रौंद सा दिया
की ये वही पत्ता था जो कभी
इस घने पेड़ की शोभा बढ़ाता था
बल्कि अपनी हरियाली के अहंकार में रहता था
और आज वो धरातल पर पड़ा है
क्योकि ये प्रकृति का नियम है
तो हम इंसानों को क्या प्रकृति ने नहीं बनाया?
हम इतने घमंड में क्यों रहते है?
ये वो सन्देश है कि जिन
लोगों के पास आज, धन, बल,
रुतबा और अहंकार में अकड़,
वो तब तो किसी को नहीं समझते
और लोगों के साथ दुराचार करते है
तो कल जब पतझड़ आएगी,
जो की निश्चित है
तो उन्हें उसका भी सामना करना है
पतझड़ केवल एक ऋतु नहीं
ये एक सन्देश है जीवन का
जीवन को जीने का
क्योंकि ये भी प्रकृति की देन है
ये प्रकृति का संदेश है
जिसे जीवन में जितनी जल्द
समावेशित कर लिया जाए
वो उतना ही फलदायक होगा।
 
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4 वर्ष पहले

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