सबकी हसरत, सबकी ख्वाहिश,
अपना हो घर द्वार,
बड़े जतन से, बड़े प्यार से
बनता है परिवार।
जज़्बात जहां पर लेते हैं,
रिश्तों का आकार,
ग़म की कोई जगह नहीं,
खुशियों का है ये दरबार।
सोच भले सबकी हो अलग,
पर दिल से दिल का जुड़ा है तार,
जीवन के दुर्गम पथ को हम,
साथ में कर लेते हैं पार।
आसानी से कट जाते हैं,
जीवन के दिन चार,
बड़ा अनमोल उपहार है ये
हम सबका परिवार।
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