कहीं तो कोई बात हुई है
बेमौसम बरसात हुई है।
दिल ही दिल रो रहा है कोई
पृत में कोई घात हुई है।
बिछड़ा है कोई मीत से अपने
नयनों से बरसात हुई है।
कहीं तो कोई बात हुई है।
सुबह से नहीं गया निवाला
किसी गरीब के उदर में ज्वाला,
भिक्षा मांग रहा है सड़क पर,
भूख से शर्म की हार हुई है।
बेमौसम बरसात हुई है।
ग़म का अंधियारा है छाया
बड़ी अंधेरी रात हुई है।
रुग्ण शरीर की पीड़ा से
कोई रुह आजाद हुईं है।
कहीं तो कोई बात हुई है
बेमौसम बरसात हुई है।
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