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अपना बचपन

                
                                                         
                            दादा दादी के किस्सों का कहां गया वो जमाना
                                                                 
                            
यादों में ही जिंदा है, भूला बिसरा फ़साना।

परियों का एक देश जहां पर दबा था इक खजाना
तिलिस्मों से भरी वो दुनिया, भय का ताना बाना।

विचरण करते स्वप्न लोक में, फिर वो नींद का आना
दिल के कोने में ज़िंदा है, किस्सा बहुत पुराना।

बांध के डोरी से तितली को, नभ में रोज उड़ाना
दिन भर खेले लुका छिपी, बेफिक्री का वो जमाना।

एक एक दिन और एक एक पल, उम्र गुजरते जाना
अपना कभी हुआ करता था, वो बचपन हुआ बेगाना।
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3 वर्ष पहले

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