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साथ निभाया है

                
                                                         
                            कुछ कर गुजरने की तमन्ना है
                                                                 
                            
रुकना मेरी आदत नहीं
निकल चलती हूं अपने दम पर
देखती मैं कोई बाधा नहीं
उम्मीद तो खुद से ही लगाई है
दूसरों से लगाई गई उम्मीदे कमजोर कर देती है
हालांकि ऎसा नहीं, किसी ने साथ नहीं दिया
कलम और किताब में मेरे कदम-कदम पर,
साथ निभाया है।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 महीने पहले

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😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
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