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गूंगे समाज: कविता

                
                                                         
                            "कविता"
                                                                 
                            
हम उस समाज के हिस्से हैं
जहां अंधी आंखें, बहरेे कान, सिले हुए होंठ,
दूर-दूर तक कोई अपनापन का सितारा
नजर नहीं आता
कौन दे किसको दिलासा
भीड़ भरी दुनिया में वह चेहरा
नजर नहीं आता
"कविता"
यहां सत्य भी बिकाऊ है
कोई झूठ का पर्दाफाश करने वाला
मसीहा नजर नहीं आता
जब शूल की तरह चुभे कोई जख्म
तब वहां दो लफ्ज़ का मरहम
लगाने वाला भी नहीं मिलता
"कविता"
यहां लफ्ज़ सब के सिले हुए हैं
गूंगे समाज में मीठे लफ्जों का,
सहानुभूति का पिटारा कोई नहीं खोलता
गूंगे समाज का गूंगापन, अंधापन
बढ़ता ही जा रहा है
कभी, कम नहीं होता
"कविता"
तुम बनकर आंखे रोशनी देती,
सत्य बनकर होठों पर सज जाती
भटकने पर सही राह दिखाती
उदासी में दिलासा देती
उम्मीद और आशा देती
जख्मों पर मरहम लगाती
मीठे वचन से मीठापन घोलती
ज़माने में तुम्हारे जैसा कौन है साथी
-ममता तिवारी
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5 महीने पहले

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