मनमोहना राग मधुर मेरे मन का
सुनना धीरे धीरे
मनमोहना तान मेरे मन का
गुनना धीरे धीरे
प्रेम गली तुम्हारी मैं तो
खो गयी एक ही पल में
खोज रही जीवन कस्तूरी
मिले कहीं न जग में
बड़ी सुगंधी पास तुम्हारे
फैली प्राणों के तीरे
मनमोहना राग मधुर मेरे मन का
धीरे धीरे सुनना।
छोड़ वसन और काया जग की
यमुना बीच खड़ी हूँ
फोड़ के सारी शीश की मटकी
हाथ बढ़ाये खड़ी हूँ
दूर न जाना, मोहन मेरे
रहना यमुना तीरे
मनमोहना का राग मधुर है
सुनना धीरे धीरे।
~ माधुरी महाकाश
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