फरवरी का पहला दिन
आज
कैलेंडर ने धीरे से पन्ना पलटा
और फरवरी
हल्की धूप की तरह
मेरे कमरे में उतर आई।
जनवरी की ठिठुरन
अब भी खिड़की के कोने में बैठी है,
पर हवा में एक नया इरादा है—
जैसे पेड़ों ने
मन ही मन तय कर लिया हो
कि अब चुप नहीं रहेंगे।
फरवरी
सिर्फ़ एक महीना नहीं,
दो ऋतुओं के बीच
खींची गई एक मुलायम रेखा है—
जहाँ सर्दी
अपना आख़िरी स्वेटर उतारती है
और बसंत
रंगों की पहली चिट्ठी लिखता है।
आज का सूरज
थोड़ा और पास लगता है,
जैसे कह रहा हो—
“जो अधूरा रह गया था,
उसे फिर से शुरू करो।”
फरवरी का पहला दिन
किसी बड़े शोर से नहीं,
एक छोटी-सी उम्मीद से शुरू होता है—
कि ठंड के बाद
हर दिल में
एक मौसम बदलता है।
और मैं
अपने भीतर की बर्फ़ पिघलते हुए सुनता हूँ,
जैसे कोई नई कहानी
धीरे-धीरे
साँस ले रही हो।
-विकास सिंघई
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