आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

फरवरी का पहला दिन

                
                                                         
                            फरवरी का पहला दिन
                                                                 
                            
आज
कैलेंडर ने धीरे से पन्ना पलटा
और फरवरी
हल्की धूप की तरह
मेरे कमरे में उतर आई।
जनवरी की ठिठुरन
अब भी खिड़की के कोने में बैठी है,
पर हवा में एक नया इरादा है—
जैसे पेड़ों ने
मन ही मन तय कर लिया हो
कि अब चुप नहीं रहेंगे।
फरवरी
सिर्फ़ एक महीना नहीं,
दो ऋतुओं के बीच
खींची गई एक मुलायम रेखा है—
जहाँ सर्दी
अपना आख़िरी स्वेटर उतारती है
और बसंत
रंगों की पहली चिट्ठी लिखता है।
आज का सूरज
थोड़ा और पास लगता है,
जैसे कह रहा हो—
“जो अधूरा रह गया था,
उसे फिर से शुरू करो।”
फरवरी का पहला दिन
किसी बड़े शोर से नहीं,
एक छोटी-सी उम्मीद से शुरू होता है—
कि ठंड के बाद
हर दिल में
एक मौसम बदलता है।
और मैं
अपने भीतर की बर्फ़ पिघलते हुए सुनता हूँ,
जैसे कोई नई कहानी
धीरे-धीरे
साँस ले रही हो।
-विकास सिंघई
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर